Saturday, 25 April 2015

स्व-जागरूकता

थोड़ी सी ख़्वाहिशें
संतुष्टि उससे जो हाथ में,
अनुभूति खुशियों की 
सभी परिस्थितियों में,
जब होने लगता अहसास
नहीं कुछ कमी स्व-उपलब्धि में,
सब कुछ हो जाता अपना
सम्पूर्ण विश्व मुट्ठी में,
हो जाता विस्तृत आयाम 
चेतना का
स्वयं की जागरूकता में।

...कैलाश शर्मा 

Wednesday, 8 April 2015

मुक्ति बंधनों से

बाँध लेते जब स्वयं को
किसी विचार, व्यक्ति या वस्तु से,
खो देते अपना अस्तित्व 
और बंध जाते उसके अस्तित्व से।

मत बांधो अपनी नौका किसी किनारे
बहने दो साथ लहरों के,
देखो अपने चारों ओर दृष्टा भाव से
होते अनवरत बदलाव,
अप्रभावित तुम्हारा अस्तित्व जिस से।

जब होता जाग्रत दृष्टा भाव
हो जाती मुक्त आत्मा
सभी बदलाव और बंधनों से.

...कैलाश शर्मा 

Thursday, 5 March 2015

अब न चढ़े कोई भी रंग सखी री

अब न चढ़े कोई भी रंग सखी री।  
अपने रंग रंगी कान्हा ने, चढ़े न दूजो रंग  सखी री।       
तन का रंग तो छुट भी जाये, मन का रंग न धुले सखी री।      
अब तो श्याम रंग ही भावे, श्याम रंग मैं रंगी सखी री।    
कोई जतन नजर न आवे, कैसे छूटे यह रंग सखी री।     
क्यों खेलन को आयी होली, कैसे घर मैं जाऊँ सखी री। 
अब तो श्याम चरण बस जाऊँ, दीखे न कोई ठांव सखी री।

**होली की हार्दिक शुभकामनाएं**

...कैलाश शर्मा 

Tuesday, 3 March 2015

जीवन

नहीं कोई अर्थ 
स्वयं में जीवन का,
देना होता अर्थ 
स्वयं ही जीवन को.

जीवन वह नहीं जो मिलता है 
जीवन वह है जो हम बनाते हैं.

जो भी आरोपित करते अर्थ 
वही रूप ले लेता जीवन.
रहना जाग्रत ही अर्थ जीवन का.

....कैलाश शर्मा 

Wednesday, 18 February 2015

क्षणिकायें

मत ढूंढो रिश्तों को 
कुछ पाने की चाहत में,
चल नहीं पायेंगे दूर तक.

जब खड़े होते हैं रिश्ते
कुछ देने की चाह की नींव पर,
झेल जाते सब आंधी तूफ़ान
और खड़े रहते साथ अंत तक.

       *****
केवल योजना और वादों पर 
नहीं बनते सफलताओं के महल,
छोटी छोटी राहों पर भी 
जो थाम लेता हाथ 
होते हुए भी अकिंचन,
बन जाता है वह
सफलता के महल की 
पहली ईंट.

...कैलाश शर्मा 

Tuesday, 10 February 2015

चुनरी रंग गयी तेरे रंग में

चुनरी रंग गयी तेरे रंग में।
श्याम रंग में जब रंग लीनी, रंगे न दूजे रंग में। 
प्यार में तेरे जोगन हो गयी, नाचूँ तेरे संग में।      
बंसी मुझे बना लो कान्हा, रहूँ अधर के संग में।    
पागल हो कर प्रेम में तेरे, भूल गयी रंग ढंग में।    
ये जग मुझको रास न आवे, बिन तेरे बेरंग मैं।
....कैलाश शर्मा            

Sunday, 21 December 2014

बाज़ी तुम्हारे अस्तित्व पर

कभी कभी झूलने लगता मन
होने या न होने के बीच
तुम्हारे अस्तित्व के।
तर्क की कसौटी
उठाती कई प्रश्न चिन्ह
अस्तित्व पर ईश्वर के।
लेकिन नहीं देती साथ
आस्था किसी तर्क का
और पाती तुम्हें साथ
हर एक पल।

क्या है सत्य?
तुम्हारे न होने का तर्क
या आस्था तुम्हारे होने की?

सोचता हूँ लगा दूँ बाज़ी
अस्तित्व पर तुम्हारे होने की,
अगर जीत जाता हूँ,
पाउँगा वह सब कुछ
जो है अतुलनीय
और नहीं रहती कोई आकांक्षा
जिसको पाने के बाद।
और अगर हार जाता हूँ
नहीं होगा कोई पश्चाताप
क्यों कि नहीं खोया कुछ भी
मैंने बाज़ी हार कर।

क्या हानि है लगाने पर बाज़ी
एक बार अपनी आस्था पर
तुम्हारे अस्तित्व के होने पर?

...कैलाश शर्मा