Wednesday, 8 November 2017

अष्टावक्र गीता - भावापद्यानुवाद (पेंतालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.३१-१८.३५)                                                                                  (With English connotation)
न ध्यान विरत, न कर्म चेष्टा, जीवन्मुक्त है चित्त न धरता|
निमित्तशून्य, ध्यान विरत है, लेकिन है स्व-कर्म भी करता|| (१८.३१)

The liberated man does not make effort to
meditate or act, but still meditates and acts
without any object. (18.31)

पूर्णतत्व का वर्णन सुनकर, मोह आचरण मूढ़ है करता|    
कभी कभी ज्ञानी जन कोई, है व्यवहार मूढ़वत करता|| (१८.३२)

An ignorant man is wonderstruck listening to
the real truth, but even the wise man is
humbled by it and behaves like a fool. (18.32)

एकाग्रता, निरोध चित्त का, सतत प्रयास मूढ़ है करता|
धीर सुषुप्तावस्था में भी, स्व-स्थित कुछ कृत्य न करता|| (१८.३३)

The ignorant man makes continuous efforts
for single-pointedness and stopping the
thoughts, but the wise man does not act
at all, remaining established in himself like
the one asleep. (18.33)

अनुष्ठान या मन निरोध से, मूढ़ शांति प्राप्त न करता|
तत्व बोध मात्र से ज्ञानी, परम शांति को प्राप्त है करता|| (१८.३४)

The stupid person does not attain the feeling
of abandonment, whether he acts or abandons
actions, whereas the wise man attains peace
within,  simply by knowing the truth. (18.34)

कर्म परायण जन हैं जग में, अनभिज्ञ आत्म स्वरूप से रहते|
शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निरामय आत्मा का है बोध न रखते|| (१८.३५)

The people who always remain engaged in
practice to know themselves, are ignorant of
themselves, which is pure awareness, clear,
complete and faultless. (18.35)


....© कैलाश शर्मा

Tuesday, 26 September 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (चवालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.२६-१८.३०)                                                                                  (With English connotation)
बिना प्रश्न जो कार्य है करता, लेकिन है विषयी न होता|
जग में सर्व कार्य करते भी, जीवन्मुक्त, सुशोभित होता|| (१८.२६)

The one, who acts without saying why, but not
because he is a fool, even while doing all the
worldly acts, remains liberated and happy. (18.26)

थक कर के नाना विचार से, अपने स्वरुप में स्थित रहता|
नहीं सोचता, नहीं जानता, न वो देखता, श्रवण न करता|| (१८.२७)

The one, who after being tired of listening to
various considerations and thoughts has
established peacefully in his Self, does not
think, know, see and listen.(18.27)

मुक्त समाधि व विषयों से, विक्षेप समाधि से परे है रहता|
सर्व विश्व कल्पित वह जाने, स्वयं ब्रह्मवत स्थिर है रहता|| (१८.२८)

The one, who is beyond mental stillness and
distractions, remains free from desire for
liberation or its opposite. Knowing that this
world is creation of imagination, he remains
established as Brahma (God). (18.28)

लोक द्रष्टि में कार्य न करके, कर्म अहंकारी सब करता|
अहंविहीना धीर पुरुष है, करके भी वह कर्म न करता|| (१८.२९)

The one, who is having ego, while not doing
any act in the eyes of the world, actually does,
but the wise man even when doing acts, in fact
does not do anything. (18.29)

संतोषी या उद्विग्न न ज्ञानी, न अभिमान कर्म का होता|
न आशा है ज्ञानी के मन में, न ही संदेह चित्त में होता|| (१८.३०)

The liberated man is neither disturbed nor
satisfied and is not proud of the acts done
by him. In the mind of the wise man there
is neither hope nor doubt. (18.30)


....© कैलाश शर्मा

Tuesday, 8 August 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (तेतालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.२१-१८.२५)                                                                                  (With English connotation)
वासना रहित व निरालम्ब है, ज्ञानी मुक्त बंधनों से रहता|
तन गतिशील प्रारब्ध वायु से, फिरता सूखे पत्ते सम रहता|| (१८.२१)

The wise man, being desireless and self reliant,
remains free from all bondages, like a dry leaf
being blown about in the strong wind of causality. (18.21)

मुक्त है जो जग के बंधन से, हर्ष विषाद मुक्त है रहता| 
वह विदेह सा आनंदित है, उसका मन है शीतल रहता|| (१८.२२)

One who is free from the bondage of the world
remains free from pleasure and sorrow. With a
peaceful mind, he remains happy as if he is
living without a body. (18.22)

रमण आत्मा में करता है, मन को शीतल स्वच्छ है रखता|
ऐसा धैर्यवान जो जन है, न ग्रहण त्याग की इच्छा करता|| (१८.२३)

One who enjoys himself and keeps his mind clean
and calm, does not have any desire for acquisition
or renunciation of anything. (18.23)

जन साधारण सा कार्य है करते, ज्ञानी चित्त शून्य है होता|
लेकिन उस ज्ञानी के मन में, अपमान मान बोध न होता|| (१८.२४)

For the wise man with naturally empty mind,
doing just as he pleases, there is no feeling
of pride or contempt, as there is in ordinary
man. (18.24)

केवल देह ही कर्म है करता, शुद्ध आत्म है कर्म न करता|
इसका बोध हो गया जिसको, करके भी वह कर्म न करता|| (१८.२५)

The one, who understands that all acts are done
by body only and the pure conscious Self does
not do anything, even when doing, does not do
any act. (18.25)


....© कैलाश शर्मा

Wednesday, 12 July 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (बयालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.१६-१८.२०)                                                                                  (With English connotation)
जिसने परम ब्रह्म को देखा, चिंतन करता है अहम् ब्रह्म का|
ब्रह्म-रूप जो सब जग जाने, उसको चिंतन करना है किसका? (१८.१६)

One who has seen Supreme Soul (Param Brahm)
may think Í am Brahm’, but what is there to think
for the person who sees the entire world as one
Soul (Brahm)?  (18.16)

जो पाता विक्षेप स्वयं में, वह उसके निरोध की चिंता करता|
कोई विक्षेप रहा न जिसका, वह न निरोध की चिंता करता|| (१८.१७)

One who has seen distraction in oneself, worries
about removing that distraction. When there is no
distraction in him, what does there remain for
him to remove. (18.17)

लोगों से विपरीत है ज्ञानी, व्यवहार सभी जन जैसा करता|
न समाधि विक्षेप या लय है, अपनी आत्मा में स्थिर रहता|| (१८.१८)

The wise man, even being opposite to the worldly
man, does not see stillness, distraction or fault in
himself and remains established in his Self. (18.18)

भाव अभाव रहित है ज्ञानी, तृप्त, कामना रहित है रहता|
लोक द्रष्टि में कर्ता लेकिन, वह जग में कुछ भी न करता|| (१८.१९)

The wise man is free from being and non-being
and being without desires remains satisfied. Even
when in the eyes of the world he appears to
doing acts, he does not do anything. (18.19)

कर्म है जो जीवन में आता, उसको वह सुख से है करता|  
कर्मों में रुचि या विरक्ति में, ज्ञानी नहीं दुराग्रह रखता|| (१८.२०)

The wise man does happily whatever comes
in his life to act. He encounters no difficulty
in doing or not doing any act. (18.20)


....© कैलाश शर्मा

Wednesday, 24 May 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (इकतालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.११-१८.१५)                                                                                (With English connotation)
राज्य मिले या भिक्षुक हो वह, योगी विकल्प रहित है रहता|
लाभ हानि, वन या समाज में, ज्ञानी को सब है सम रहता||(१८.११)

The kingdom of heaven or beggary, profit or loss,
living in forest or society, all these make no
difference to the Yogi whose nature is to be free
from distinctions.(18.11)

क्या है किया और क्या करना, इन द्वंद्वों से मुक्त है रहता|
धर्म है क्या, क्या अर्थ काम है, ज्ञानी नहीं प्रयोजन रखता||(१८.१२)

There is no religion, no wealth and no sensuality
for the Yogi who is free from conflict of what he
has already done and what is yet to be done.(18.12)

न उसका है कर्तव्य कर्म को, न ही अनुराग किसी से होता|
जो भी मिला रहा खुश उससे, ऐसा जन ही योगी है होता||(१८.१३)

There is nothing required to be done nor any attachment in the heart of the Yogi. He is happy 
with whatever he gets in life.(18.13)

कहाँ मोह है, कहाँ ये जग है, कहाँ मुक्ति या ध्यान है होता|
इन सब से वह मुक्त है योगी, जिसको आत्मज्ञान है होता||(१८.१४)

There is no attachment, world, meditation on that
and liberation to the Yogi, who is established in
Self and is free from all these.(18.14)

जिसने है इस जग को देखा, जाने वह यह सत्य नहीं है|  
जो वासना रहित जन होता, दृश्यमान भी विश्व नहीं है||(१८.१५)

One who sees this world knows definitely that this
world is not real, but desire-less one even while
seeing this world does not see it.(18.15)


....© कैलाश शर्मा

Friday, 24 March 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (चालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.०६-१८.१०)                                                                                (With English connotation)
मोह मात्र रहित होने पर, अपना स्वरुप ज्ञात है होता|
दृष्टि पटल विलीन होते ही, शोक रहित ज्ञानी है होता||(१८.६)

When one, whose vision is unclouded, becomes
free from ignorance and attachment and realises
his true nature, he lives without sorrow.(18.6)

मात्र कल्पना सर्व जगत है, मुक्त सनातन आत्म है रहता|
ज्ञानी जन है सत्य जानकर, बालक सा व्यवहार न करता||(१८.७)

Knowing that the world is mere imagination and
the soul is eternally free, the knowledgeable
person does not behave like a fool.(18.7)

आत्मा को ही ब्रह्म है जाने, भाव अभाव कल्पना माने|
निष्काम पुरुष जानकर ऐसा, कहे करे और क्या जाने||(१८.८)

Knowing himself as Brahm (Supreme) and
being and non-being only imagination, there
is nothing for a person, free from desire, to
say, do or know more.(18.8)

आत्मा का अस्तित्व सभी में, ऐसा जान जो है चुप रहता|
ऐसे ज्ञानी के अंतस में, मैं यह या मैं वह न संशय रहता||(१८.९)

The doubt that ‘I am this’ or ‘I am that’ is calmed
in the Yogi after realising that I am in everything.(18.9)

अपने स्वरुप में शांत जो ज्ञानी, न विक्षुब्ध न तन्मय रहता|
न ही ज्ञान है, न ही मूढ़ता, सुख दुःख से वह परे है रहता||(१८.१०)

For the Yogi who is established and found peace
in himself, there is neither distraction nor one-
pointedness, neither knowledge nor ignorance
and he remains beyond happiness and sorrow.(18.10)


....© कैलाश शर्मा

Thursday, 23 February 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (उन्तालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.०१-१८.०५)                                                                                (With English connotation)
अष्टावक्र कहते हैं :
Ashtavakra says :

स्वप्न टूट जाता है जगने पर, नष्ट जगत का भ्रम है होता|   
नमन प्रकाश रूप आत्मा को, जिसे आत्म बोध है होता||(१८.१)

Bow to that light which is blissful awareness and by
realising that delusion is removed like dream.(18.1)

अर्जित कर दौलत असीम है, भोग सभी निश्चय कर सकता|
लेकिन परित्याग बिन सबके, सुख जीवन में प्राप्त न करता||(१८.२)

One may earn unlimited wealth and acquire all
material objects of enjoyment, but he can not
acquire happiness without relinquishing every

क्या करना या न करना है, झुलस रहा मन जिसका इससे|
कर्म त्याग की शांति बिना है, उसको सुख मिल पाये कैसे||(१८.३)

How can there be peace to one who is burning
with the flame of what to do or what not to do.
How can one attain peace and happiness in life
without becoming desireless.(18.3)

केवल संकल्प मात्र यह जग है, सत्य अर्थ में नहीं है कुछ भी|
भाव अभाव रूप जो जाने, उसको नहीं अभाव है कुछ  भी||(१८.४)

This world is mere imagination and in reality it
is non-existing. But there is nothing non-being
to one, who understands to differentiate
between being and non-being.(18.4)

न तो दूर न पास है तुमसे, है आत्म स्वरुप प्राप्त तुमको ही|    
निर्विकल्प, निरायास, निरंजन, निर्विकार रूप हो तुम ही||(१८.५)

The realm of inner Self is neither far nor near
from you. You are nothing but unimaginable,
effortless, unchanging and spotless Self.(18.5)


....© कैलाश शर्मा

Tuesday, 24 January 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (अड़तीसवीं कड़ी)

                 सत्रहवां अध्याय (१७.१६-१७.२०)                                                                                (With English connotation)
जो आसक्तिहीन पुरुष होता है, न हिंसा या करुणा होती|
न आश्चर्य या क्षोभ है करता, न अहंकार, कातरता होती||(१७.१६)

One who is unattached to the world, does not
possess violence or compassion, wonder or
confusion and pride or submissiveness.(17.16)

जीवन्मुक्त व्यक्ति जो होता, मोह, द्वेष न विषयों से रखता|
प्राप्त अप्राप्त है जो किस्मत से, उसमें सदैव ही है सम रहता||(१७.१७)

One who is liberated is not attached or averse to
senses. Hence, he maintains equanimity in his achievement and failure both.(17.17)

समाधान, संदेह परे वह, हित या अहित न चिंतित करता|
शून्य चित्त वाला वह ज्ञानी, स्व-आत्मानंद में स्थित रहता||(१७.१८)

One with empty mind is beyond doubts and their
solutions, does not think about good or bad and
remains established in the bliss of Self.(17.18)

द्रश्य जगत को सत्य न माने, परे अहंकार, आसक्ति से रहता|     
सब इच्छाओं से रहित है होकर, करते हुए भी कुछ न करता||(१७.१९)

One who is free from pride and attachment and
does not perceive this world as real, being free
from all desires, even while doing does not do

विगलित हुआ मोह है जिसका, मुक्त स्वप्न, जड़ता से रहता|
परित्याग कर सभी कामना, आत्मानंद वह प्राप्त है करता||(१७.२०)

One, who has dissolved attachment to the mind,
is free from delusion, dream, inertia and
desires, remains established in Self.(17.20)

               **सत्रहवां अध्याय समाप्त**

....© कैलाश शर्मा