Wednesday, 10 June 2015

खुशियों का आधार

जीवन की खुशियों का आधार
नहीं केवल उपलब्धियां,
प्रयास अनुभव करने का
जीवन में खुशियाँ
कम से कम बाह्य वस्तुओं में।

धन नहीं है पर्याय
संग्रह सांसारिक वस्तुओं का,
असली धन है
होना न्यूनतम इच्छाओं का।


...कैलाश शर्मा


Tuesday, 5 May 2015

आध्यात्मिक यात्रा

तलाशते राह
आध्यात्मिक विकास की
पर्वतों की कंदराओं में
नदियों के किनारे
गुरु के सामीप्य में,
नहीं कभी झांकते
अपने अंतर्मन में,
नहीं करते प्रारंभ यात्रा
अपने अन्दर से.

होती यात्रा प्रारंभ
जब अन्दर से बाहर,
होते समर्थ खोजने में
सार स्व-अस्तित्व का.
अंतस का प्रकाश
देता एक नव ज्योति
एक नव दृष्टि
देखने को बाह्य जगत 
और कर पाते सुगमता से
आत्मसात एक वृहद सत्य
स्व-अनुभूति में.

...कैलाश शर्मा 

Saturday, 25 April 2015

स्व-जागरूकता

थोड़ी सी ख़्वाहिशें
संतुष्टि उससे जो हाथ में,
अनुभूति खुशियों की 
सभी परिस्थितियों में,
जब होने लगता अहसास
नहीं कुछ कमी स्व-उपलब्धि में,
सब कुछ हो जाता अपना
सम्पूर्ण विश्व मुट्ठी में,
हो जाता विस्तृत आयाम 
चेतना का
स्वयं की जागरूकता में।

...कैलाश शर्मा 

Wednesday, 8 April 2015

मुक्ति बंधनों से

बाँध लेते जब स्वयं को
किसी विचार, व्यक्ति या वस्तु से,
खो देते अपना अस्तित्व 
और बंध जाते उसके अस्तित्व से।

मत बांधो अपनी नौका किसी किनारे
बहने दो साथ लहरों के,
देखो अपने चारों ओर दृष्टा भाव से
होते अनवरत बदलाव,
अप्रभावित तुम्हारा अस्तित्व जिस से।

जब होता जाग्रत दृष्टा भाव
हो जाती मुक्त आत्मा
सभी बदलाव और बंधनों से.

...कैलाश शर्मा 

Thursday, 5 March 2015

अब न चढ़े कोई भी रंग सखी री

अब न चढ़े कोई भी रंग सखी री।  
अपने रंग रंगी कान्हा ने, चढ़े न दूजो रंग  सखी री।       
तन का रंग तो छुट भी जाये, मन का रंग न धुले सखी री।      
अब तो श्याम रंग ही भावे, श्याम रंग मैं रंगी सखी री।    
कोई जतन नजर न आवे, कैसे छूटे यह रंग सखी री।     
क्यों खेलन को आयी होली, कैसे घर मैं जाऊँ सखी री। 
अब तो श्याम चरण बस जाऊँ, दीखे न कोई ठांव सखी री।

**होली की हार्दिक शुभकामनाएं**

...कैलाश शर्मा 

Tuesday, 3 March 2015

जीवन

नहीं कोई अर्थ 
स्वयं में जीवन का,
देना होता अर्थ 
स्वयं ही जीवन को.

जीवन वह नहीं जो मिलता है 
जीवन वह है जो हम बनाते हैं.

जो भी आरोपित करते अर्थ 
वही रूप ले लेता जीवन.
रहना जाग्रत ही अर्थ जीवन का.

....कैलाश शर्मा 

Wednesday, 18 February 2015

क्षणिकायें

मत ढूंढो रिश्तों को 
कुछ पाने की चाहत में,
चल नहीं पायेंगे दूर तक.

जब खड़े होते हैं रिश्ते
कुछ देने की चाह की नींव पर,
झेल जाते सब आंधी तूफ़ान
और खड़े रहते साथ अंत तक.

       *****
केवल योजना और वादों पर 
नहीं बनते सफलताओं के महल,
छोटी छोटी राहों पर भी 
जो थाम लेता हाथ 
होते हुए भी अकिंचन,
बन जाता है वह
सफलता के महल की 
पहली ईंट.

...कैलाश शर्मा