Tuesday, 10 February 2015
Sunday, 21 December 2014
बाज़ी तुम्हारे अस्तित्व पर
कभी कभी झूलने लगता मन
होने या न होने के बीच
तुम्हारे अस्तित्व के।
तर्क की कसौटी
उठाती कई प्रश्न चिन्ह
अस्तित्व पर ईश्वर के।
लेकिन नहीं देती साथ
आस्था किसी तर्क का
और पाती तुम्हें साथ
हर एक पल।
होने या न होने के बीच
तुम्हारे अस्तित्व के।
तर्क की कसौटी
उठाती कई प्रश्न चिन्ह
अस्तित्व पर ईश्वर के।
लेकिन नहीं देती साथ
आस्था किसी तर्क का
और पाती तुम्हें साथ
हर एक पल।
क्या है सत्य?
तुम्हारे न होने का तर्क
या आस्था तुम्हारे होने की?
तुम्हारे न होने का तर्क
या आस्था तुम्हारे होने की?
सोचता हूँ लगा दूँ बाज़ी
अस्तित्व पर तुम्हारे होने की,
अगर जीत जाता हूँ,
पाउँगा वह सब कुछ
जो है अतुलनीय
और नहीं रहती कोई आकांक्षा
जिसको पाने के बाद।
और अगर हार जाता हूँ
नहीं होगा कोई पश्चाताप
क्यों कि नहीं खोया कुछ भी
मैंने बाज़ी हार कर।
अस्तित्व पर तुम्हारे होने की,
अगर जीत जाता हूँ,
पाउँगा वह सब कुछ
जो है अतुलनीय
और नहीं रहती कोई आकांक्षा
जिसको पाने के बाद।
और अगर हार जाता हूँ
नहीं होगा कोई पश्चाताप
क्यों कि नहीं खोया कुछ भी
मैंने बाज़ी हार कर।
क्या हानि है लगाने पर बाज़ी
एक बार अपनी आस्था पर
तुम्हारे अस्तित्व के होने पर?
एक बार अपनी आस्था पर
तुम्हारे अस्तित्व के होने पर?
...कैलाश शर्मा
Saturday, 22 November 2014
'मैं'
'मैं' हूँ नहीं यह शरीर
'मैं' हूँ जीवन सीमाओं से परे,
मुक्त बंधनों से शरीर के।
'मैं' हूँ अजन्मा
न ही कभी हुई मृत्यु,
'मैं' हूँ सदैव मुक्त समय से
न मेरा आदि है न अंत।
'मैं' हूँ जीवन सीमाओं से परे,
मुक्त बंधनों से शरीर के।
'मैं' हूँ अजन्मा
न ही कभी हुई मृत्यु,
'मैं' हूँ सदैव मुक्त समय से
न मेरा आदि है न अंत।
'मैं' हूँ सच्चा मार्गदर्शक
जो भी थामता मेरा हाथ
नहीं होता कभी पथ भ्रष्ट,
लेकिन देता अधिकार चुनने का
मार्ग अपने विवेकानुसार,
टोकता हूँ अवश्य
पर नहीं रोकता निर्णय लेने से,
'मैं' हूँ सर्व-नियंता, सर्व-ज्ञाता
लेकिन बहुत दूर अहम् से।
जो भी थामता मेरा हाथ
नहीं होता कभी पथ भ्रष्ट,
लेकिन देता अधिकार चुनने का
मार्ग अपने विवेकानुसार,
टोकता हूँ अवश्य
पर नहीं रोकता निर्णय लेने से,
'मैं' हूँ सर्व-नियंता, सर्व-ज्ञाता
लेकिन बहुत दूर अहम् से।
...कैलाश शर्मा
Friday, 31 October 2014
चुनौतियाँ
कठिनाइयाँ नहीं बाधायें राह की,
चुनौतियां देती प्रेरणा और जोश
मंज़िल को पाने की,
लगती हैं चुनौतियाँ कठिन
जब होता सामना उनसे,
लेकिन हो जातीं कितनी छोटी
उन पर विजय के बाद,
चलती गाड़ी से दिखते
पेड़ की तरह,
लगता विशाल नज़दीक आने पर
लेकिन दिखता कितना छोटा
पीछे छूट जाने पर।
...कैलाश शर्मा
चुनौतियां देती प्रेरणा और जोश
मंज़िल को पाने की,
लगती हैं चुनौतियाँ कठिन
जब होता सामना उनसे,
लेकिन हो जातीं कितनी छोटी
उन पर विजय के बाद,
चलती गाड़ी से दिखते
पेड़ की तरह,
लगता विशाल नज़दीक आने पर
लेकिन दिखता कितना छोटा
पीछे छूट जाने पर।
...कैलाश शर्मा
Monday, 20 October 2014
अप्प दीपो भव
बुद्ध है बोध अपने "मैं" का
एक मार्ग पहचानने का अपने आप को,
नहीं करा सकता कोई और
पहचान मेरी मेरे "मैं" से,
मिटाना होगा स्वयं ही
अँधेरा अपने अंतस का,
'अप्प दीपो भव' नहीं केवल एक सूत्र
यह है एक शाश्वत सत्य,
अनंत प्रकाश को जीवन में
बनना होता अपना दीप स्वयं ही,
किसी अन्य का दीपक
कर सकता रोशन राह
केवल कुछ दूर तक,
फ़िर अनंत अंधकार और भटकाव
शेष जीवन राह में।
जलाओ दीपक अपने अंतस में
समझो अर्थ अपने होने का,
बढ़ो उस राह जो हो आलोकित
स्व-प्रज्वलित ज्ञान दीप से।
...कैलाश शर्मा
Thursday, 18 September 2014
मनवा न लागत है तुम बिन
मनवा न लागत है तुम
बिन.
जब से श्याम गए हो
ब्रज से, तड़पत है हिय निस दिन.
सूना लागत बंसीवट का
तट, न लागत मन तुम बिन.
पीत कपोल भये हैं
कारे, अश्रु बहें नयनन से निस दिन.
अटके प्रान गले में
अब तक, आस दरस की निस दिन.
वृंदा सूख गयी है वन
में, यमुना तट उदास है तुम बिन.
आ जाओ अब तो तुम
कान्हा, प्यासा मन है तुम बिन.
...कैलाश शर्मा
Tuesday, 26 August 2014
आधा अधूरा सत्य
ढो रहे हैं
अपने अपने कंधों पर
अपना अपना सत्य
अनज़ान सम्पूर्ण सत्य से।
अपने अपने कंधों पर
अपना अपना सत्य
अनज़ान सम्पूर्ण सत्य से।
प्रत्येक का अपना सत्य
समय, परिस्थिति, सोच अनुसार
जो बन जाता उसका सम्पूर्ण सत्य
और बाँध देता उसकी सोच
अपने चारों ओर जीवन भर।
समय, परिस्थिति, सोच अनुसार
जो बन जाता उसका सम्पूर्ण सत्य
और बाँध देता उसकी सोच
अपने चारों ओर जीवन भर।
प्रतिज्ञाबद्ध भीष्म का
अपनी प्रतिज्ञा का सच
जो कर देता आँखें बंद
अन्य सभी सच से,
दुर्योधन को अपना अपमान
बन जाता अपना सच
करने को अपमान द्रोपदी का,
अपने अपमान का प्रतिशोध
द्रोपदी का अपना सच,
अहसानों की जंजीरों में आबद्ध
द्रोणाचार्य, कर्ण का अपना सच,
सम्पूर्ण सच से बाँध पट्टी आँखों पर
उतरे सभी महाभारत युद्ध में
अपने अपने सच को साथ लेकर।
अपनी प्रतिज्ञा का सच
जो कर देता आँखें बंद
अन्य सभी सच से,
दुर्योधन को अपना अपमान
बन जाता अपना सच
करने को अपमान द्रोपदी का,
अपने अपमान का प्रतिशोध
द्रोपदी का अपना सच,
अहसानों की जंजीरों में आबद्ध
द्रोणाचार्य, कर्ण का अपना सच,
सम्पूर्ण सच से बाँध पट्टी आँखों पर
उतरे सभी महाभारत युद्ध में
अपने अपने सच को साथ लेकर।
कितना सापेक्ष हो गया है सच
क्यों बंधे रहते केवल अपने सच से,
क्यों बाँध लेते पट्टी आँखों पर
जब खड़ा होता सम्पूर्ण सत्य सामने।
क्यों बंधे रहते केवल अपने सच से,
क्यों बाँध लेते पट्टी आँखों पर
जब खड़ा होता सम्पूर्ण सत्य सामने।
सत्य केवल सत्य होता है
कोई आधा अधूरा नहीं
सापेक्षता से कोसों दूर,
काश स्वीकार कर पाते
अस्तित्व सम्पूर्ण सत्य का
टल जाते कितने महाभारत जीवन में।
कोई आधा अधूरा नहीं
सापेक्षता से कोसों दूर,
काश स्वीकार कर पाते
अस्तित्व सम्पूर्ण सत्य का
टल जाते कितने महाभारत जीवन में।
....© कैलाश शर्मा
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