Saturday, 22 November 2014

'मैं'

'मैं' हूँ नहीं यह शरीर
'मैं' हूँ जीवन सीमाओं से परे,
मुक्त बंधनों से शरीर के।
'मैं' हूँ अजन्मा
न ही कभी हुई मृत्यु,
'मैं' हूँ सदैव मुक्त समय से
न मेरा आदि है न अंत।

'मैं' हूँ सच्चा मार्गदर्शक
जो भी थामता मेरा हाथ
नहीं होता कभी पथ भ्रष्ट,
लेकिन देता अधिकार चुनने का
मार्ग अपने विवेकानुसार,
टोकता हूँ अवश्य
पर नहीं रोकता निर्णय लेने से,
'मैं' हूँ सर्व-नियंता, सर्व-ज्ञाता
लेकिन बहुत दूर अहम् से।

...कैलाश शर्मा 

13 comments:

  1. अहम से दूरी जरूरी है। अच्‍छा विचार।

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  2. सुंदर प्रस्तुति

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  3. गहन एवं विचारणीय प्रस्तुति ! बहुत सुन्दर !

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  4. हमेशा की तरह बहुत गहरी और सुंदर ।

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  5. मैं जब तक अहम् की सीमाओं से परे रहता है जरूरी होता है ...
    गहन अभिव्यक्ति ...

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  6. सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  7. मैं' हूँ अजन्मा
    न ही कभी हुई मृत्यु,
    'मैं' हूँ सदैव मुक्त समय से
    न मेरा आदि है न अंत।
    गहन अभिव्यक्ति

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  8. बेहद गहन भाव लिये अनुपम प्रस्तुति, सादर ...

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  9. अच्छी प्रस्तुती..

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