Wednesday, 19 June 2019

अष्टावक्र गीता - भावपद्यानुवाद (बासठवीं कड़ी)

                                     बीसवाँ अध्याय (२०.६-२०.१०)                                                                                                       (With English connotation)

स्थित आत्म-रूप अद्वैत में मुझको, लोक और मुमुक्ष कहाँ है?
कौन है योगी व ज्ञानवान कौन है, कहाँ बंध व मुक्त कहाँ है? (२०.६)

For me, who is established in his non-dual Self,
there is no world or search for liberation, no yogi
or seer and no bondage or liberation. (20.6)

अद्वैत आत्म-रूप में स्थित मुझको, सृष्टि और संहार कहाँ है?
कौन साध्य है या है साधन, कहाँ है साधक या सृष्टि कहाँ है? (२०.७)

For me, who is established in his non-dual
existence, there is no creation or annihilation,
no goal or means and no seeker or achievement. (20.7)

निर्मल-रूप सर्वदा मुझको, कौन है ज्ञाता या साक्ष्य कहाँ है?
क्या है स्वल्प व पूर्ण कहाँ है, क्या है ज्ञेय व ज्ञान कहाँ है? (२०.८)

There is no knower or evidence, neither less nor
complete and no knowable or knowledge to me,
who is always pure Self. (20.8)

क्रिया-रहित सर्वदा मुझको, क्या विक्षेप, एकाग्रता कहाँ है?
क्या है मूढ़ता या विवेक भी, उसको हर्ष, विषाद कहाँ है? (२०.९)

For me, who is free from all actions, there is no
distraction or concentration of mind, there is
no stupidity or discretion and no happiness or
sorrow. (20.9)

निर्मल-रूप सर्वदा मुझको, क्या सुख है या दुःख क्या होता?
अर्थ नहीं संसार का उसको, परमारथ भी उसको क्या होता? (२०.१०)

There is no happiness or sorrow and no meaning
of this or the other world for me, who is always
established in his spotless Self. (20.10)


                                     ...क्रमशः

...© कैलाश शर्मा                    

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