Monday, 26 November 2018

अष्टावक्र गीता - भावपद्यानुवाद (अड़तालीसवीं कड़ी)

                                     अठारहवाँ अध्याय (१८.४६-१८.५०)                                                                                                       (With English connotation)

रहित-वासना सिंह पुरुष को, देख विषय हाथी छुप जाते|

गज विषयों की एक न चलती, वे उसके सेवक बन जाते|| (१८.४६)

Seeing the desireless man like lion, the elephants
of senses run away and if they are not able to
do so, they surrender and serve him as servant. (18.46)

स्थिर मन, निशंक ज्ञानी है, न मुक्ति उपायों का हठ करता|
लोकदृष्टि सब कर्म है करते, आत्मानंद में स्थिर वह रहता|| (१८.४७)

The one who is established in self and is free from
doubts, does not make strenuous efforts for
liberation. Even while doing all the acts of senses,
he remains at peace and established in his self. (18.47)

तत्वरूप के श्रवण मात्र से, चिंता रहित है ज्ञानी होता|
अनाचार आचार उदासी, इन कर्मों से वह मुक्त है होता|| (१८.४८)

The one, whose mind is carefree and undisturbed,
merely by hearing the Truth, is free from doing
all acts as he does not find anything to do or not
to do or even for indifference. (18.48)

जो स्वभाव में स्थित ज्ञानी, बालक सम वह कार्य है करता|
शुभ या अशुभ कर्म जो आता, बाल सुलभ प्रयास से करता|| (१८.४९)

The  one who is straightforward does, like a child,
whatever act, good or bad, is presented before him. (18.49)

स्वतंत्रता से सुख मिलता है, परमतत्व भी प्राप्त है होता|   
स्वतंत्रता से शांति है मिलती और परमपद प्राप्त है होता|| (१८.५०)

By inner freedom one attains happiness and also
realises the Supreme. By inner freedom one 
achieves eternal peace and ultimate state. (18.50)


                                                 ...क्रमशः


....© कैलाश शर्मा

1 comment:

  1. तत्व चिंतन हर बंधन से मुक्त कर देता है..आभार !

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