Friday, 8 February 2019

अष्टावक्र गीता - भावपद्यानुवाद (पचपनवीं कड़ी)

                                     अठारहवाँ अध्याय (१८.८१-१८.८५)                                                                                                       (With English connotation)
वह न लाभ की इच्छा करता, और हानि का शोक न करता|
अमृत से पूरित है उर उसका, ज्ञानी सदैव ही शीतल रहता|| (१८.८१)

The Yogi desires neither possessions nor grieves
for their loss. His mind is always calm as it is full
of nectar of immortality. (18.81)

संतों की स्तुति ज्ञानी न करता, न निंदा वह दुष्टों की करता|
सुख दुःख में समान वह रह कर, स्व-आत्म संतृप्त है रहता|| (१८.८२)

The wise does not praise the saints nor blames
the wicked. Being content in his inner Self, he
maintains equanimity in pleasure or pain. (18.82)

शोक विमुक्त होता है जग से, न आत्म-दृष्टि की इच्छा करता|
स्व-आत्म रूप स्थित वह ज्ञानी , न जीवित न मृत ही रहता|| (१८.८३)

The wise man does not despise the world, nor he
desires to know himself. Being established in his
Self, he is neither dead nor alive. (18.83)

स्त्री पुत्रादि मोह न जिसका, विषयों में निष्काम है रहता|
चिंता रहित हो स्व-शरीर से, ज्ञानी सदा सुशोभित रहता|| (१८.८४)

The wise man is free from attachment to worldly
relations like wife or son and free from desires
for pleasures of senses. Being unconcerned even
with his own body, the wise always stands out. (18.84)

ज्ञानी को जो प्राप्त है जग में, तदानुसार संतुष्ट है रहता|
मुक्त विचरता है वह जग में, सर्वत्र सदा सुखी वह रहता|| (१८.८५)

The wise is satisfied with whatever he has acquired
in the world. He moves freely in the world and
always remains happy in all circumstances. (18.85)

                                         ...क्रमशः

....© कैलाश शर्मा

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-02-2019) को "तम्बाकू दो त्याग" (चर्चा अंक-3243) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. इसका अर्थ हुआ केवल ज्ञानी ही जीवन का मर्म समझता है..

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