Thursday, 23 February 2017

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (उन्तालीसवीं कड़ी)

                     अठारहवाँ अध्याय (१८.०१-१८.०५)                                                                                (With English connotation)
अष्टावक्र कहते हैं :
Ashtavakra says :

स्वप्न टूट जाता है जगने पर, नष्ट जगत का भ्रम है होता|   
नमन प्रकाश रूप आत्मा को, जिसे आत्म बोध है होता||(१८.१)

Bow to that light which is blissful awareness and by
realising that delusion is removed like dream.(18.1)

अर्जित कर दौलत असीम है, भोग सभी निश्चय कर सकता|
लेकिन परित्याग बिन सबके, सुख जीवन में प्राप्त न करता||(१८.२)

One may earn unlimited wealth and acquire all
material objects of enjoyment, but he can not
acquire happiness without relinquishing every

क्या करना या न करना है, झुलस रहा मन जिसका इससे|
कर्म त्याग की शांति बिना है, उसको सुख मिल पाये कैसे||(१८.३)

How can there be peace to one who is burning
with the flame of what to do or what not to do.
How can one attain peace and happiness in life
without becoming desireless.(18.3)

केवल संकल्प मात्र यह जग है, सत्य अर्थ में नहीं है कुछ भी|
भाव अभाव रूप जो जाने, उसको नहीं अभाव है कुछ  भी||(१८.४)

This world is mere imagination and in reality it
is non-existing. But there is nothing non-being
to one, who understands to differentiate
between being and non-being.(18.4)

न तो दूर न पास है तुमसे, है आत्म स्वरुप प्राप्त तुमको ही|    
निर्विकल्प, निरायास, निरंजन, निर्विकार रूप हो तुम ही||(१८.५)

The realm of inner Self is neither far nor near
from you. You are nothing but unimaginable,
effortless, unchanging and spotless Self.(18.5)


....© कैलाश शर्मा