Sunday, 3 July 2016

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (बत्तीसवीं कड़ी)

                  पन्द्रहवां अध्याय (१५.१६-१५.२०)                                                                               (With English connotation)
केवल तेरे अज्ञान के कारण, जगत सत्य लगता है तुमको|
आत्मज्ञान प्राप्त होने पर, अलग नहीं रहता कुछ तुमको||(१५.१६)

This world appears to be real due to your
ignorance. Knowing that you alone are real,
there remains nothing apart from you.(15.16)

यह जग भ्रामक व असत्य है, जिसका कोई अस्तित्व न होता|
इच्छा चेष्टा रहित बिना कब, कौन शान्ति को प्राप्त है होता||(१५.१७)

This world is unreal and illusion and has no
existence. Who can attain peace, without
becoming free from efforts and desires.(15.17)

तुम इस संसार रूप सागर में, थे सदा अकेले और रहोगे|
मुक्त मोक्ष, बंधन से तुम हो, आप्त-काम सुख से विचरोगे||(१५.१८)

You alone existed, exist and will exist in this ocean
of world. Being free from bondage or liberation,
live happily and satisfied.(15.18)

क्षुब्ध करो न अपने मन को, संकल्प विकल्पों में फस करके|
स्थित हो स्व-आनंद रुप में, अपना मन तुम शांत है करके||(१५.१९)

You do not be aggrieved by involving yourself in
different resolves or alternatives. Be at peace and
enjoy by remaining in yourself.(15.19)

सब वस्तु से ध्यान त्याग कर, कुछ विचार न मन में लाओ|
तुमको चिंतन अब क्या करना, मुक्त आत्मरूप जब पायो||(१५.२०)

Remove your attention from everything and do not
retain any thought in your heart. Since you are
yourself liberated soul, what remains for you to
think now.(15.20)

                   **पंद्रहवां अध्याय समाप्त**


....© कैलाश शर्मा