Wednesday, 4 May 2016

अष्टावक्र गीता - भाव पद्यानुवाद (उन्तीसवीं कड़ी)

                 पन्द्रहवां अध्याय (१५.१-१५.५)                                                                                  (with English connotation)
अष्टावक्र कहते हैं :
Ashtavakra says :

सात्विक बुद्धि युक्त जो जन है, कुछ उपदेश से मुक्ति है पाता|
असत् बुद्धि जिज्ञासु जीवन भर, न बन पाता ब्रह्म का ज्ञाता||(१५.१)

A man of pure intelligence may attain his goal by
casual instructions, whereas the other one even
after seeking knowledge throughout his life, may
be unable to achieve the goal.(15.1)

विषय विराग मोक्ष का रस्ता, विषयों में आनंद है बंधन|
इन सब का तुम ज्ञान है करके, करो वही जो कहता है मन||(१५.२)

Indifference to sense objects is way to liberation.
Pleasure in sense objects is bondage. After having
knowledge of all this, you should do as you wish.(15.2)

जो वाचाल, ज्ञानी, उद्योगी, तत्वबोध शांत व जड़ करता|
सुख का इच्छुक जो जन होता, सत्यत्याग इस लिए  करता||(१५.३)

Awareness of truth makes eloquent, intelligent
and industrious man calm, dumb and inactive.
Therefore, the truth is discarded by those who
are desirous of enjoyment.(15.3)

न तुम शरीर न यह तन तेरा, न तुम कर्ता या भोक्ता हो|
रहो सुखी चैतन्य व शाश्वत, तुम निरपेक्ष और साक्षी हो||(१५.४)

You are neither this body nor this body is yours.
You are neither the doer of actions nor the
beneficiary of their fruits. You are pure
consciousness, eternal, devoid of desires and
mere witness to the actions, so be happy.(15.4)

राग द्वेष ये धर्म हैं मन के, किंचित हैं न मन के गुण तुम में|
ज्ञान स्वरुप कामनारहित तुम, निर्विकार स्थित हो सुख में||(१५.५)

Desires and angers are the traits of the mind,
but you are not mind. You are choiceless and
spotless awareness and, therefore, be happy.(15.5)

                                             ...क्रमशः
....©कैलाश शर्मा

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर पद्यानुवाद। .
    आभार !

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  2. बेहद खूबसूरत अनुवाद। अति सुन्दर।

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  3. सुन्दर प्रयास कैलाश शर्मा जी

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  4. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 06/05/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 294 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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  5. जो मन कहे वो करो ... बहुत सुन्दर अनुवाद ...

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  6. सुंदर और सार्थक पोस्ट

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  7. न तुम शरीर न यह तन तेरा, न तुम कर्ता या भोक्ता हो|
    रहो सुखी चैतन्य व शाश्वत, तुम निरपेक्ष और साक्षी हो
    ये श्रृंखला स्वतः ही बुला लेती है अपनी ओर ! सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय शर्मा जी !!

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  8. बहुत ही सुंदर प्रयास। अनुवाद करके आप इसे पूरी दुनिया में प्रसारित कर हैं। यह अच्‍छा है।

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